वाल्मीकि रामायण 3.75.6
हृदये हि नर व्याघ्र शुभम् आविर्भविष्यति ।तत् आगच्छ गमिष्यावः पंपाम् ताम् प्रिय दर्शनाम्॥
hṛdaye hi nara vyāghra śubham āvirbhaviṣyati |tat āgaccha gamiṣyāvaḥ paṃpām tām priya darśanām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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