वाल्मीकि रामायण 4.10.32
अमोघाः सूर्य संकाशा निशिता मे शरा इमे ।तस्मिन् वालिनि दुर्वृत्ते पतिष्यन्ति रुष अन्विताः॥
amoghāḥ sūrya saṃkāśā niśitā me śarā ime |tasmin vālini durvṛtte patiṣyanti ruṣa anvitāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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