वाल्मीकि रामायण 4.12.3
स विसृष्टो बलवता बाणः स्वर्ण परिष्कृतः ।भित्त्वा सालान् गिरि प्रस्थम् सप्त भूमिम् विवेश ह॥
sa visṛṣṭo balavatā bāṇaḥ svarṇa pariṣkṛtaḥ |bhittvā sālān giri prastham sapta bhūmim viveśa ha ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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