वाल्मीकि रामायण 4.12.5
तान् दृष्ट्वा सप्त निर्भिन्नान् सालान् वानरपुंगवः ।रामस्य शर वेगेन विस्मयम् परमम् गतः॥
tān dṛṣṭvā sapta nirbhinnān sālān vānarapuṃgavaḥ |rāmasya śara vegena vismayam paramam gataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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