वाल्मीकि रामायण 4.16.39
अथ उक्षितः शोणित तोय विस्रवैःसुपुष्पित अशोक इव अचलोद्गतः ।विचेतनो वासव सूनुर् आहवेप्रभ्रञ्शित इन्द्र ध्वजवत् क्षितिम् गतः॥
atha ukṣitaḥ śoṇita toya visravaiḥsupuṣpita aśoka iva acalodgataḥ |vicetano vāsava sūnur āhaveprabhrañśita indra dhvajavat kṣitim gataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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