वाल्मीकि रामायण 4.17.50
राक्षसम् च दुरात्मानाम् तव भार्य अपहारिणम् ।कण्ठे बद्ध्वा प्रदद्याम् ते अनिहतम् रावणम् रणे॥
rākṣasam ca durātmānām tava bhārya apahāriṇam |kaṇṭhe baddhvā pradadyām te anihatam rāvaṇam raṇe ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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