वाल्मीकि रामायण 4.18.33
आर्येण मम मान्धात्रा व्यसनम् घोरम् ईप्सितम् ।श्रमणेन कृते पापे यथा पापम् कृतम् त्वया॥
āryeṇa mama māndhātrā vyasanam ghoram īpsitam |śramaṇena kṛte pāpe yathā pāpam kṛtam tvayā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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