वाल्मीकि रामायण 4.18.46
प्रतिवक्तुम् प्रकृष्टे हि न अपकृष्टः तु शक्नुयात् ।यत् अयुक्तम् मया पूर्वम् प्रमादात् वाक्यम् अप्रियम्॥
prativaktum prakṛṣṭe hi na apakṛṣṭaḥ tu śaknuyāt |yat ayuktam mayā pūrvam pramādāt vākyam apriyam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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