वाल्मीकि रामायण 4.19.15
अथवा अरुचितम् स्थानम् इह ते रुचिरानने ।आविशन्ति हि दुर्गाणि क्षिप्रम् अद्य एव वानराः॥
athavā arucitam sthānam iha te rucirānane |āviśanti hi durgāṇi kṣipram adya eva vānarāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें