वाल्मीकि रामायण 4.20.19
समाश्वासय पुत्रम् त्वम् संदेशम् संदिशस्व मे ।मूर्ध्नि च एनम् समाघ्राय प्रवासम् प्रस्थितो हि असि॥
samāśvāsaya putram tvam saṃdeśam saṃdiśasva me |mūrdhni ca enam samāghrāya pravāsam prasthito hi asi ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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