वाल्मीकि रामायण 4.23.18
गिरि गह्वर संलीनम् दीप्तम् आशी विषम् यथा ।तस्य निष्कृष्यमाणस्य बाणस्य च बभौ द्युतिः॥
giri gahvara saṃlīnam dīptam āśī viṣam yathā |tasya niṣkṛṣyamāṇasya bāṇasya ca babhau dyutiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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