वाल्मीकि रामायण 4.24.2
स बाष्प पूर्णेन मुखेन् पश्यन् क्षणेन निर्विण्ण मना मनस्वी ।जगाम रामस्य शनैः समीपम् भृत्यैः वृत्तः संपरिदूयमानः॥
sa bāṣpa pūrṇena mukhen paśyan kṣaṇena nirviṇṇa manā manasvī |jagāma rāmasya śanaiḥ samīpam bhṛtyaiḥ vṛttaḥ saṃparidūyamānaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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