वाल्मीकि रामायण 4.24.3
स तम् समासाद्य गृहीत चापम् उदात्तम् आशी विष तुल्य बाणम् ।यशश्विनम् लक्षण लक्षित अंगम् अवस्थितम् राघवम् इति उवाच॥
sa tam samāsādya gṛhīta cāpam udāttam āśī viṣa tulya bāṇam |yaśaśvinam lakṣaṇa lakṣita aṃgam avasthitam rāghavam iti uvāca ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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