वाल्मीकि रामायण 4.25.7
न कालस्य अस्ति बंधुत्वम् न हेतुर् न पराक्रमः ।न मित्र ज्ञाति संबन्धः कारणम् न आत्मनो वशः॥
na kālasya asti baṃdhutvam na hetur na parākramaḥ |na mitra jñāti saṃbandhaḥ kāraṇam na ātmano vaśaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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