वाल्मीकि रामायण 4.29.13
संत्यज्य सर्व कर्माणि मित्रार्थम् यो न वर्तते ।संभ्रमात् हि कृत उत्साहः सः अनर्थेन अवरुध्यते॥
saṃtyajya sarva karmāṇi mitrārtham yo na vartate |saṃbhramāt hi kṛta utsāhaḥ saḥ anarthena avarudhyate ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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