वाल्मीकि रामायण 4.29.3
निवृत्त कार्यम् सिद्धार्थम् प्रमद अभिरतम् सदा ।प्राप्तवन्तम् अभिप्रेतान् सर्वान् एव मनोरथान्॥
nivṛtta kāryam siddhārtham pramada abhiratam sadā |prāptavantam abhipretān sarvān eva manorathān ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें