वाल्मीकि रामायण 4.29.7
प्रसाद्य वाक्यैः मधुरैः हेतुमद्भिः मनो रमैः ।वाक्यवित् वाक्य तत्त्वज्ञम् हरीशम् मारुतात्मजः॥
prasādya vākyaiḥ madhuraiḥ hetumadbhiḥ mano ramaiḥ |vākyavit vākya tattvajñam harīśam mārutātmajaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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