वाल्मीकि रामायण 4.31.7
न इदम् अत्र त्वया ग्राह्यम् साधु वृत्तेन लक्ष्मण ।ताम् प्रीतिम् अनुवर्तस्व पूर्व वृत्तम् च संगतम्॥
na idam atra tvayā grāhyam sādhu vṛttena lakṣmaṇa |tām prītim anuvartasva pūrva vṛttam ca saṃgatam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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