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वाल्मीकि रामायण 4.35.22
ऋक्ष कोटि सहस्राणि गोलांगूल शतानि च ।अद्य त्वाम् उपयास्यन्ति जहि कोपम् अरिन्दमकोट्यो अनेकाः तु काकुत्स्थ कपीनाम् दीप्त तेजसाम्॥
ṛkṣa koṭi sahasrāṇi golāṃgūla śatāni ca |adya tvām upayāsyanti jahi kopam arindamakoṭyo anekāḥ tu kākutstha kapīnām dīpta tejasām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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