वाल्मीकि रामायण 4.39.20
ऋक्षाणाम् भीम वेगानाम् धूम्रः शत्रु निबर्हणः ।वृतः कोटि सहस्राभ्याम् द्वाभ्याम् समभिवर्तत॥
ṛkṣāṇām bhīma vegānām dhūmraḥ śatru nibarhaṇaḥ |vṛtaḥ koṭi sahasrābhyām dvābhyām samabhivartata ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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