वाल्मीकि रामायण 4.39.33
ततो रंभः तु अनुप्राप्तः तरुण आदित्य संनिभः ।आयुतेन वृतः चैव सहस्रेण शतेन च॥
tato raṃbhaḥ tu anuprāptaḥ taruṇa āditya saṃnibhaḥ |āyutena vṛtaḥ caiva sahasreṇa śatena ca ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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