वाल्मीकि रामायण 4.39.5
त्वत् स नाथः सखे संख्ये जेता अस्मि सकलान् अरीन् ।त्वम् एव मे सुहृत् मित्रम् साहाय्यम् कर्तुम् अर्हसि॥
tvat sa nāthaḥ sakhe saṃkhye jetā asmi sakalān arīn |tvam eva me suhṛt mitram sāhāyyam kartum arhasi ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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