वाल्मीकि रामायण 4.42.18
विचरन्ति विशाले अस्मिन् तोय पूर्णे समन्ततः ।तस्य शृंगम् दिव स्पर्शम् कांचनम् चित्र पादपम्॥
vicaranti viśāle asmin toya pūrṇe samantataḥ |tasya śṛṃgam diva sparśam kāṃcanam citra pādapam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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