वाल्मीकि रामायण 4.42.51
एतावत् वानरैः शक्यम् गन्तुम् वानर पुंगवाः ।अभास्करम् अमर्यादम् न जानीमः ततः परम्॥
etāvat vānaraiḥ śakyam gantum vānara puṃgavāḥ |abhāskaram amaryādam na jānīmaḥ tataḥ param ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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