वाल्मीकि रामायण 4.48.3
पर्वताग्र नदी दुर्गान् सरांसि विपुल द्रुमान् ।वृक्ष खण्डान् च विविधान् पर्वतान् वन पादपान्॥
parvatāgra nadī durgān sarāṃsi vipula drumān |vṛkṣa khaṇḍān ca vividhān parvatān vana pādapān ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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