वाल्मीकि रामायण 4.54.14
स्वल्पम् हि कृतम् इन्द्रेण क्षिपता हि अशनिम् पुरा ।लक्ष्मणो निशितैः बाणैः भिन्द्यात् पत्र पुटम् यथा॥
svalpam hi kṛtam indreṇa kṣipatā hi aśanim purā |lakṣmaṇo niśitaiḥ bāṇaiḥ bhindyāt patra puṭam yathā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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