वाल्मीकि रामायण 4.60.7
हृष्ट पक्षि गण आकीर्णः कन्दर उदर कूटवान् ।दक्षिणस्य उदधेः तीरे विन्ध्यो अयम् इति निश्चितः॥
hṛṣṭa pakṣi gaṇa ākīrṇaḥ kandara udara kūṭavān |dakṣiṇasya udadheḥ tīre vindhyo ayam iti niścitaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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