वाल्मीकि रामायण 4.61.2
भगवन् व्रण युक्तत्वात् लज्जया च अकुल इन्द्रियः ।परिश्रान्तो न शक्नोमि वचनम् परिभाषितुम्॥
bhagavan vraṇa yuktatvāt lajjayā ca akula indriyaḥ |pariśrānto na śaknomi vacanam paribhāṣitum ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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