वाल्मीकि रामायण 4.7.8
बाष्पम् आपतितम् धैर्यात् निग्रहीतुम् त्वम् अर्हसि ।मर्यादाम् सत्त्व युक्तानाम् धृतिम् न उत्स्रष्टुम् अर्हसि॥
bāṣpam āpatitam dhairyāt nigrahītum tvam arhasi |maryādām sattva yuktānām dhṛtim na utsraṣṭum arhasi ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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