वाल्मीकि रामायण 5.1.120
अतिथिः किलपूजार्हः प्राकृतोऽपि विजानता ।धर्मं जिज्ञासमानेन किं पुनस्त्वादृशो महान्॥
atithiḥ kilapūjārhaḥ prākṛto'pi vijānatā |dharmaṃ jijñāsamānena kiṃ punastvādṛśo mahān ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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