वाल्मीकि रामायण 5.1.130
श्रमं मोक्षय पूजां च गृहाण कपिसत्तम ।प्रीतिं च बहुमन्यस्व प्रीतोऽस्मि तव दर्शनात्॥
śramaṃ mokṣaya pūjāṃ ca gṛhāṇa kapisattama |prītiṃ ca bahumanyasva prīto'smi tava darśanāt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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