वाल्मीकि रामायण 5.1.132
त्वरते कार्यकालो मे अहश्चाप्यतिवर्तते ।प्रतिज्ञा च मया दत्ता न स्थातव्यमिहान्त्तरे॥
tvarate kāryakālo me ahaścāpyativartate |pratijñā ca mayā dattā na sthātavyamihānttare ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें