वाल्मीकि रामायण 5.1.178
महर्षिगणगन्धर्वनागयक्षसमाकुले ।विविक्ते विमले विश्वे विश्वावसुनिषेविते॥
maharṣigaṇagandharvanāgayakṣasamākule |vivikte vimale viśve viśvāvasuniṣevite ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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