वाल्मीकि रामायण 5.1.184
इति संचिन्त्य मनसा छायामस्य समाक्षिपत् ।छायायां गृह्यमाणायां चिन्तयामास वानरः॥
iti saṃcintya manasā chāyāmasya samākṣipat |chāyāyāṃ gṛhyamāṇāyāṃ cintayāmāsa vānaraḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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