वाल्मीकि रामायण 5.1.187
छाय्तद्धृष्ट्वा चिन्तयामास मारुतिर्विकृताननम् ।कपिराजेन कथितं सत्त्वमद्भुतदर्शनम्॥
chāytaddhṛṣṭvā cintayāmāsa mārutirvikṛtānanam |kapirājena kathitaṃ sattvamadbhutadarśanam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें