वाल्मीकि रामायण 5.1.198
साधयार्थमभिप्रेतमरिष्टं प्लवतां वर ।यस्य त्वेतानि चत्वारि वानरेन्द्र यथा तव॥
sādhayārthamabhipretamariṣṭaṃ plavatāṃ vara |yasya tvetāni catvāri vānarendra yathā tava ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें