वाल्मीकि रामायण 5.1.204
निरुन्धन्तमिवाकाशं चकार मतिमान् मतिम् ।कायवृद्धिं प्रवेगं च मम दृष्ट्वव राक्षसाः॥
nirundhantamivākāśaṃ cakāra matimān matim |kāyavṛddhiṃ pravegaṃ ca mama dṛṣṭvava rākṣasāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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