वाल्मीकि रामायण 5.1.39
यथा राघवनिर्मुक्तः शरः श्वसनविक्रमः ।गच्चेत्तद्वद्गमिष्यामि लङ्कां रावणपालिताम्॥
yathā rāghavanirmuktaḥ śaraḥ śvasanavikramaḥ |gaccettadvadgamiṣyāmi laṅkāṃ rāvaṇapālitām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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