वाल्मीकि रामायण 5.1.45
समुत्पतति तस्मिंस्तु वेगात्ते नगरोहिणः ।संहृत्य विटपान् सर्वान् समुत्पेतुः समन्ततः॥
samutpatati tasmiṃstu vegātte nagarohiṇaḥ |saṃhṛtya viṭapān sarvān samutpetuḥ samantataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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