वाल्मीकि रामायण 5.1.57
पर्वताग्राद्विनिष्क्रान्तौ पञ्चास्याविव पन्नगौ ।पिबन्निव बभौ चापि सोओर्मिमालं महार्णवम्॥
parvatāgrādviniṣkrāntau pañcāsyāviva pannagau |pibanniva babhau cāpi soormimālaṃ mahārṇavam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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