वाल्मीकि रामायण 5.1.63
व्यरोचत महाप्राज्ञः परिवेषीव भास्करः ।स्फिग्देशेनाभिताम्रेण रराज स महाकपिः॥
vyarocata mahāprājñaḥ pariveṣīva bhāskaraḥ |sphigdeśenābhitāmreṇa rarāja sa mahākapiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें