वाल्मीकि रामायण 5.1.71
विकर्षन्नूर्मिजालानि बृहन्ति लवणाम्भसि ।पुप्लुवे कपिशार्दूलो विकिरन्निव रोदसी॥
vikarṣannūrmijālāni bṛhanti lavaṇāmbhasi |pupluve kapiśārdūlo vikiranniva rodasī ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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