वाल्मीकि रामायण 5.1.91
शेषं च मयि विश्रान्तः सुखेनातिपतिष्यति ।इति कृत्वा मतिं साध्वीं समुद्रश्चन्नमम्भसि॥
śeṣaṃ ca mayi viśrāntaḥ sukhenātipatiṣyati |iti kṛtvā matiṃ sādhvīṃ samudraścannamambhasi ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें