वाल्मीकि रामायण 5.13.11
विवेष्टमाना पतिता समुद्रे जनक आत्मजा ।आहो क्षुद्रेण च अनेन रक्षन्ती शीलम् आत्मनः॥
viveṣṭamānā patitā samudre janaka ātmajā |āho kṣudreṇa ca anena rakṣantī śīlam ātmanaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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