वाल्मीकि रामायण 5.13.12
अबन्धुर् भक्षिता सीता रावणेन तपस्विनी ।अथवा राक्षस इन्द्रस्य पत्नीभिर् असित ईक्षणा॥
abandhur bhakṣitā sītā rāvaṇena tapasvinī |athavā rākṣasa indrasya patnībhir asita īkṣaṇā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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