वाल्मीकि रामायण 5.13.18
रामस्य प्रिय भार्यस्य न निवेदयितुम् क्षमम् ।निवेद्यमाने दोषः स्याद् दोषः स्याद् अनिवेदने॥
rāmasya priya bhāryasya na nivedayitum kṣamam |nivedyamāne doṣaḥ syād doṣaḥ syād anivedane ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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