वाल्मीकि रामायण 5.13.31
पन्चत्व गमने राज्ञः तारा अपि न भविष्यति ।माता पित्रोर् विनाशेन सुग्रीव व्यसनेन च॥
pancatva gamane rājñaḥ tārā api na bhaviṣyati |mātā pitror vināśena sugrīva vyasanena ca ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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