वाल्मीकि रामायण 5.13.57
नमः कृत्वा गमिष्यामि रक्षसाम् शोक वर्धनः ।जित्वा तु राक्षसान् देवीम् इक्ष्वाकु कुल नन्दिनीम्॥
namaḥ kṛtvā gamiṣyāmi rakṣasām śoka vardhanaḥ |jitvā tu rākṣasān devīm ikṣvāku kula nandinīm ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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