वाल्मीकि रामायण 5.13.61
स गत्वा मनसा पूर्वम् अशोक वनिकाम् शुभाम् ।उत्तरम् चिन्तयाम् आस वानरो मारुत आत्मजः॥
sa gatvā manasā pūrvam aśoka vanikām śubhām |uttaram cintayām āsa vānaro māruta ātmajaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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