वाल्मीकि रामायण 5.14.2
स तु सम्हृष्ट सर्व अन्गः प्राकारस्थो महा कपिः ।पुष्पित अग्रान् वसन्त आदौ ददर्श विविधान् द्रुमान्॥
sa tu samhṛṣṭa sarva angaḥ prākārastho mahā kapiḥ |puṣpita agrān vasanta ādau dadarśa vividhān drumān ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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